आज अयोध्या को जो रूप दिया गया है, क्या वो कांग्रेस के शासनकाल में संभव था? क्या कांग्रेस को इस बात से मतलब है कि अयोध्या में इंटरनेशनल एयरपोर्ट होना चाहिए और उसका नाम भगवान राम के गुरु महर्षि वाल्मिकि के नाम पर होना चाहिए. क्या कांग्रेस को अयोध्या में दीपोत्सव के मायने पता हैं ? क्या कांग्रेस को अयोध्या में धाम नाम जोड़े जाने के मायने पता हैं. दरअसल करोड़ों भारतवासियों के राममंदिर को बनता देखने के सपने से कांग्रेस को कोई मतलब नहीं है. क्योंकि राम, अयोध्या और राममंदिर उसके एजेंडे में ही नहीं है. क्योंकि वो अपने कोर वोटर को नाराज नहीं करना चाहता. कांग्रेस को भले ही हिंदुओं की आस्था से कोई मतलब न हो, लेकिन उसे इस बात से दिक्कत है कि राम मंदिर को चुनाव में भुनाया जा रहा है. कांग्रेस से पूछा जाना चाहिए राममंदिर का मुद्दा जो हर भारतीय के दिल के इतने करीब था वो उसकी प्राथमिकता में क्यों नहीं था.
कांग्रेस की आपत्ति है कि चुनाव के वक्त रामंदिर का उद्घाटन क्यों हो रहा है. तो कांग्रेस को इतनी सी मामूली बात समझनी होगी कि इसी को स्ट्रेटजी कहते हैं. अगर यह संयोग न होकर राजनीतिक लाभ के मकसद से भी अगर चुनाव के वक्त मंदिर का उद्घाटन हो रहा है तो भी इसका फायदा क्या उस दल को नहीं मिलना चाहिए. जिस दल के नेताओं ने मंदिर के संघर्ष में अपना जीवन खपा दिया हो.

आज, अयोध्या में भव्य राममंदिर बनकर तैयार है, करोड़ों रामभक्तों को उस पल का इंतजार है जब रामलला प्राण प्रतिष्ठा के बाद मंदिर में विराजमान होंगे. राममंदिर के लिए किया गया लंबा संघर्ष अब मंदिर के रूप में आकार ले रहा है. 22 जनवरी को लोग प्राण प्रतिष्ठा के दिन अपने घरों में दीप जलाकर भगवान राम के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित करने को बेकरार हैं. लेकिन इतना सब कुछ होने के बाद भी देश के प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस को इसमें स्टंट नजर आ रहा है. कांग्रेस का मानना है कि मंदिर का उद्घाटन लोकसभा चुनाव के आसपास होना एक नौटंकी है.

ये वही कांग्रेस है जिसके नेतृत्व में यूपीए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में रामसेतु मामले में अपने हलफनामे में रामायण को मिथकीय कथा बताते हुए कहा था कि रामसेतु के ऐतिहासिक और पुरातात्विक अवशेष होने के कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं. कर्नाटक कांग्रेस के नेता और सरकार में मंत्री दशरथैया सुधाकर का कहना है कि पिछले चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने पुलवामा के आतंकी हमले का फायदा उठाया था, इस बार वो भगवान राम और राममंदिर का इस्तेमाल कर रहे हैं. ऐसे में दशरथैया सुधाकर से सवाल किया जाना चाहिए कि क्या राममंदिर बनवाने का क्रेडिट बीजेपी को नहीं मिलना चाहिए. क्या बीजेपी राममंदिर के लिए किए गए संघर्ष में शामिल नहीं थी. दरअसल कांग्रेस को डर है कि अयोध्या का लौटा वैभव और भव्य मंदिर में रामलला के प्रतिष्ठित होने के बाद उसकी बची-खुची राजनीति भी खत्म हो जाएगी.
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