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प्रयागराज में संगम पर मिले सरस्वती नदी के निशान, वैज्ञानिकों ने दिए पुख्ता सबूत

Anju Pankaj Desk, May 13, 2026

तीर्थराज प्रयाग में संगम पर विलुप्त हो चुकी सरस्वती नदी के सबूत मिले हैं, संगम तट के आसपास की जमीन के नीचे एक ऐसी नदी मिली है जो कभी जमीन की सतह पर प्रवाहित होती थी. आधुनिक उपकरणों की मदद से हुई रिसर्च में एक दबा हुआ पैलियो नदी चैनल (Paleo River Channel) मिला है इसका आकार ठीक वैसा ही है जैसा गंगा और यमुना का है. पौराणिक कथाओं के मुताबिक संगम पर गंगा और यमुना के साथ-साथ सरस्वती का भी संगम है जो काफी साल पहले लुप्त हो चुकी है. सरस्वती नदी को अदृश्य भी माना जाता है.

अब वैज्ञानिकों ने अपने ताजा शोध के बाद सरस्वती नदी के अस्तित्व के दावे को मान्यता दी है. वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद और नेशनल ज्योग्राफिक रिसर्च इंस्टीट्यूट हैदराबाद के शोधकर्ताओं ने एडवांस एयरबोर्न जिओफिजिकल तकनीक और कंफर्मेटरी ड्रिलिंग का इस्तेमाल करके इस बड़े पैलियो नदी चैनल की पहचान की है. कहा जाता है जो पुरानी नदियां होती हैं और एक समय के बाद सतह पर न दिखकर मिट्टी के परतों के नीचे दबी हुई होती हैं. इसी दबी हुई परत को वैज्ञानिकों ने खोज निकाला है.

संगम तट पर बने किले जिसे अकबर का किला भी कहा जाता है उसके अंदर एक सरस्वती कुंड भी है. ऐसा दावा किया जाता है कि सरस्वती कुंड का जो पानी है वह ठीक वैसा ही है जो सरस्वती नदी के उद्गम स्थल का पानी है. इन दोनों जगह के पानी की विशेषताएं एक जैसी ही है. काफी पहले हुए शोध में संगम तट पर पाए गए पानी में इस कुंड और सरस्वती के उद्गम स्थल के पानी के गुण मिले थे. इस आधार पर यह दावा किया जाता था कि यह सरस्वती नदी के अस्तित्व का जीवंत प्रमाण है. अभी ताजा शोध के बाद इस दावे की वैज्ञानिक पुष्टि हो गई है.

सरस्वती नदी की पौराणिक मान्यता

एक प्रसिद्ध मान्यता के अनुसार, सरस्वती नदी को ऋषि उत्तंक या अन्य पौराणिक प्रसंगों में श्राप मिलने के कारण वह धरती के नीचे विलुप्त हो गई थीं। इसी कारण उन्हें ‘अदृश्य’ या ‘गुप्त’ नदी भी कहा जाता है। ऋग्वेद में सरस्वती का वर्णन एक अत्यंत वेगवती और पवित्र नदी के रूप में मिलता है। यह माना जाता है कि अधिकांश वैदिक ऋचाओं की रचना इसी नदी के तट पर हुई थी, इसलिए इसे ‘वेदों की जननी’ भी कहा जाता है। पौराणिक ग्रंथों में गंगा को ‘पाप नाशिनी’ माना गया है, लेकिन सरस्वती के लिए कहा जाता है कि केवल उनके स्मरण या दर्शन मात्र से ही मनुष्य के अज्ञान का नाश हो जाता है और उसे आत्मज्ञान प्राप्त होता है। ऐतिहासिक शोध ऋग्वेद के नदी-सूक्त का हवाला देते हैं, जिसमें सरस्वती को ‘नदीतमे’ (नदियों में सर्वश्रेष्ठ) कहा गया है और इसे यमुना और सतलुज के बीच बहने वाली एक विशाल नदी बताया गया है।

सरस्वती नदी को लेकर हुए भौगोलिक और ऐतिहासिक शोध आधुनिक विज्ञान और प्राचीन साहित्य के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी जोड़ते हैं। वैज्ञानिकों और इतिहासकारों ने सैटेलाइट इमेजरी और भू-वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर इस नदी के अस्तित्व को समझने की कोशिश की है: आधुनिक शोध में ‘पेलियो-चैनल’ (पुराने नदी मार्ग) का अध्ययन सबसे प्रमुख है:

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो (ISRO) ने सैटेलाइट डेटा के माध्यम से राजस्थान और हरियाणा के रेगिस्तानी इलाकों के नीचे दबे हुए पुराने जल मार्गों का पता लगाया है। ये मार्ग वर्तमान घग्गर-हकरा नदी के प्रवाह क्षेत्र से मेल खाते हैं।

शोधकर्ताओं का मानना है कि लगभग 4,000 से 5,000 साल पहले भीषण विवर्तनिक हलचलों (Tectonic shifts) के कारण सरस्वती की सहायक नदियाँ (जैसे सतलुज और यमुना) अपना रास्ता बदल गईं, जिससे यह नदी सूख गई। इतिहासकारों ने सिन्धु घाटी सभ्यता और सरस्वती के बीच गहरा संबंध पाया है: पुरातात्विक खुदाई में पाया गया है कि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो काल की अधिकांश बस्तियाँ (लगभग 60-80%) सिन्धु नदी के बजाय उस मार्ग पर बसी थीं जहाँ कभी सरस्वती बहती थी। इसलिए कई विद्वान इसे ‘सरस्वती-सिन्धु सभ्यता’ कहना अधिक सटीक मानते हैं।

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