ईरान के साथ अमेरिका और इजरायल की जंग छिड़ गई है। इजरायल ने अमेरिका के साथ मिलकर ईरान की राजधानी तेहरान और उसके दूसरे कई शहरों पर बड़ा हमला किया है। इस हमले में ईरान के रक्षा मंत्री अमीर नसीरजादेह और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के कमांडर मोहम्मद पकपूर की मौत हो गई है। इसके अलावा दक्षिण में ईरान में एक स्कूल पर मिसाइल गिरने से 80 से ज्यादा छात्राओं की मौत हुई है। इस हमले के विरोध में ईरान ने इजरायल पर करीब 400 मिसाइल दागी हैं। इसके अलावा उसने कतर, जॉर्डन, बहरीन, सऊदी अरब में अमेरिका ठिकानों को भी निशाना बनाया है। दुबई शहर को भी ईरान ने निशाना बनाया.
तनाव की वजह
अमेरिका-ईरान और इजरायल-ईरान के बीच तनाव नया नहीं है। इसकी जड़ें कई दशकों पुरानी हैं। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से ही ईरान और अमेरिका के संबंध शत्रुतापूर्ण रहे हैं। अमेरिकी दूतावास बंधक संकट के बाद दोनों देशों के रिश्ते कभी सामान्य नहीं हो सके। अमेरिका लंबे समय से ईरान पर परमाणु कार्यक्रम को लेकर प्रतिबंध लगाता रहा है।
2015 का परमाणु समझौता (JCPOA) कुछ समय के लिए राहत लाया, लेकिन 2018 में अमेरिका के समझौते से बाहर निकलने के बाद तनाव फिर बढ़ गया। क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर भी दोनों देशों में टकराव है—ईरान इराक, सीरिया, लेबनान (हिज्बुल्लाह) और यमन में प्रभाव रखता है, जिसे अमेरिका और उसके सहयोगी चुनौती मानते हैं।
इजरायल-ईरान टकराव की बात करें तो इजरायल ईरान को अपनी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है। इजरायल का आरोप है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित करने की कोशिश कर रहा है। ईरान इजरायल के अस्तित्व को मान्यता नहीं देता और फिलिस्तीनी संगठनों (हमास, हिज्बुल्लाह) का समर्थन करता है। पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच “छाया युद्ध” (Shadow War) चलता रहा है—साइबर हमले, गुप्त ऑपरेशन, सीरिया में हवाई हमले आदि।
मध्य पूर्व पहले से ही अस्थिर क्षेत्र रहा है। गाजा संघर्ष, लेबनान सीमा पर झड़पें, और फारस की खाड़ी में नौसैनिक तनाव ने हालात को और संवेदनशील बनाया है। यदि प्रत्यक्ष हमले हुए हैं, तो संभवतः यह पहले से चल रहे प्रॉक्सी संघर्ष के खुली जंग में बदलने का संकेत होगा।