अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इन दिनों पूरे विश्व की धड़कने बढ़ा दी हैं. ईरान पर संभावित हमले की आशंका और ग्रीनलैंड को लेकर डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक सोच ने वैश्विक राजनीति में तनाव जरूर बढ़ाया है. तमाम लोग ऐसी आशंका जता रहे हैं कि इससे हम विश्व युद्ध की ओर बढ़ते नजर आ रहे हैं. ईरान पर अमेरिकी रुख को देखकर बड़े टकराव की आशंका खारिज नहीं की जा सकती है. टेंशन किस कदर बढ़ गई है, इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि कतर स्थित अमेरिकी एयरबेस से कुछ सैन्यकर्मियों को हटने की सलाह दी गई है.
बता दें कि ट्रंप ने ईरान में प्रदर्शनकारियों को कुचलने की सरकारी कोशिशों पर सख्ती दिखाते हुए कहा कि अगर प्रदर्शनकारियों को फांसी दी गई तो आप कुछ ऐसा देखेंगे जिसकी आपने कल्पना नहीं की होगी. ट्रंप ने ये भी कहा कि मदद रास्ते में है. जाहिर है ईरान में अमेरिका की सैन्य कार्रवाई हुई तो इसका व्यापक असर होगा.
वहीं ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की बात दोहराई है. अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा है कि ग्रीनलैंड पर अमेरिका का कब्जा होना जरूरी है और इससे कम कुछ भी मंजूर नहीं. उन्होंने कहा कि अमेरिका को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ग्रीन लैंड की जरूरत है. इस मामले में NATO को अमेरिका का साथ देना चाहिए. अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड को कंट्रोल नहीं किया तो रूस और चीन यहां अपना असर बढ़ा सकते हैं. जो हमें स्वीकार नहीं है. उधर ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री ने अमेरिकी धमकी से डरे बगैर साफ कहा है कि अगर ग्रीनलैंड को अमेरिका और डेनमार्क में से किसी एक को चुनना होगा तो वो डेनमार्क को चुनेगा.
ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी ख्वाहिश को उसकी आक्रामक भू-राजनीतिक नीति और आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती महाशक्ति प्रतिस्पर्धा से जोड़कर देखा जा रहा है. हालांकि इन कदमों को सीधे “विश्व युद्ध” की तैयारी कहना अतिशयोक्ति होगी, लेकिन यह साफ है कि ऐसी नीतियाँ वैश्विक अस्थिरता बढ़ाती हैं और बड़े टकराव का खतरा पैदा करती हैं.
बेहतर होता कि ट्रंप अपने पिछले युद्धविराम और सुलह कराने के दावे को बेहतर करने की कोशिश करते. इससे वो शांति पुरस्कार पाने के असली हकदार भी हो जाते. लेकिन यहां तस्वीर कुछ और ही है, ट्रंप बारूद में चिंगारी लगाने के लिए उतारू बैठे हैं. ट्रंप पर काबू उनके देश के लोग ही कर सकते हैं.