शादी से पहले फिजिकल रिलेशनशिप को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने हैरानी जताई है. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि- हो सकता है कि हम पुरानी विचारधारा के हों, लेकिन जब तक विवाह नहीं हो जाता तब तक लड़का और लड़की अजनबी होते हैं. उन्हें बहुत सावधान रहना चाहिए किसी पर भी भरोसा नहीं करना चाहिए. जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि यह हम यह नहीं समझ पाते की एक लड़का और लड़की शादी से पहले शारीरिक संबंध (physical relations) कैसे बना सकते हैं.
दरअसल ऐसे ही एक मामले में आरोपी की जमानती अर्जी सुनवाई चल रही थी. जिसमें एक महिला ने आरोपी पर शादी का वादा करके शारीरिक संबंध बनाने का आरोप लगाया है. वहीं आरोपी व्यक्ति पर पहले से शादीशुदा होने के बाद भी दूसरी महिला से शादी का आरोप है. उस पर आरोप है कि उसने शादी का वादा करके दिल्ली और दुबई में कई बार पीड़िता से शारीरिक संबंध बनाए. सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना ने ये बातें केस की सुनवाई के दौरान कही.
रिश्तों की बदलती परिभाषा और नैतिकता का प्रश्न
सुप्रीम कोर्ट द्वारा विवाह से पहले शारीरिक संबंधों पर जताई गई हैरानी केवल एक कानूनी टिप्पणी भर नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज में तेजी से बदलती जीवनशैली और नैतिक मूल्यों पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी है. न्यायालय की यह टिप्पणी उस व्यापक सामाजिक बदलाव की ओर संकेत करती है, जिसमें पारंपरिक मान्यताएँ और आधुनिक सोच आमने-सामने खड़ी दिखाई देती हैं. भारतीय समाज में विवाह को केवल सामाजिक अनुबंध नहीं, बल्कि एक पवित्र संस्कार माना गया है. परिवार व्यवस्था, जिम्मेदारी, प्रतिबद्धता और सामाजिक संतुलन की धुरी विवाह संस्था ही रही है. ऐसे में विवाह से पहले शारीरिक संबंधों को लेकर न्यायालय की चिंता इस बात को रेखांकित करती है कि कहीं न कहीं सामाजिक मर्यादाओं और नैतिक सीमाओं को लेकर भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो रही है.
यह भी सच है कि समय के साथ समाज बदलता है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का दायरा बढ़ता है. लेकिन स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के बीच की रेखा बेहद महीन होती है. जब संबंध केवल आकर्षण या क्षणिक भावनाओं पर आधारित होने लगते हैं, तो परिवार और समाज की स्थिरता पर उसका प्रभाव पड़ता है. बढ़ते तलाक, टूटते रिश्ते और मानसिक तनाव इस बदलाव के दुष्परिणाम के रूप में सामने आ रहे हैं.
नैतिकता की सीख केवल उपदेश देने भर से नहीं आती, बल्कि वह परिवार, शिक्षा और सामाजिक वातावरण से विकसित होती है. युवाओं को आधुनिकता के साथ-साथ जिम्मेदारी का भी बोध कराना आवश्यक है. रिश्तों में सम्मान, विश्वास और दीर्घकालिक प्रतिबद्धता जैसे मूल्यों को पुनर्स्थापित करने की जरूरत है. सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को किसी एक वर्ग या पीढ़ी के खिलाफ टिप्पणी के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक आत्ममंथन के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए. यदि समाज को सशक्त और संतुलित बनाना है, तो स्वतंत्रता के साथ नैतिक अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व को भी समान महत्व देना होगा. यही स्वस्थ और स्थायी सामाजिक व्यवस्था की आधारशिला है.