NSA अजित डोभाल के बयान पर महबूबा मुफ्ती की आपत्ति कितनी जायज है, ये तो दूसरा सवाल है. लेकिन पहला सवाल ये है कि अगर प्रतिशोध की बात उठ रही है तो उसकी वजह क्या है और क्या वो वजह गलत है. लेकिन अगर प्रतिशोध की आग जल रही है तो इसका मतलब है इतिहास में जरूर कुछ गलत हुआ है. अगर किसी समाज, किसी संस्कृति के साथ गलत हुआ है और वो प्रतिशोध की आग उसमें अभी भी जल रही है. तो फिर तो सवाल उससे पूछा जाना चाहिए जिसे किसी की प्रतिशोध की आग से आपत्ति है. बेहतर होता कि इतिहास में हुई वहशियाना हरकतों के लिए रत्ती भर का अफसोस जताया गया होता. क्या विदेशी आक्रमणकारियों की खूनी तलवारें भारतीय संस्कृति और समाज को नहीं रौंदा. क्या अनगिनत लोगों को लूट और धर्म के नाम पर नहीं मारा गया. पीढ़ियों तक उन्हें गुलाम नहीं बनाया गया. इन सवालों के जवाब कौन देगा.
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोभाल ने कहा है कि – भारत को न केवल सीमाओं पर बल्कि हर तरह से खुद को मजबूत करना होगा. जिससे कि हमलों और पराधीनता के दर्दनाक इतिहास का प्रतिशोध लिया जा सके. विकसित भारत युवा नेतृत्व संवाद के उद्घाटन समारोह में उन्होंने कहा कि प्रतिशोध शब्द अच्छा तो नहीं है, लेकिन यह अपने आप में बड़ी शक्ति हो सकती है. हमें अपने इतिहास का प्रतिशोध लेना है और देश को फिर उस मुकाम पर ले जाना है, जहां यह न केवल सीमा सुरक्षा के मामलों में बल्कि अर्थव्यवस्था, सामाजिक विकास समेत हर मोर्चे पर फिर से महान बनें.
एनएसए के प्रतिशोध वाले बयान पर पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने आपत्ति जताई है. उन्होंने कहा कि – ऐसी भाषा नफरत को बढ़ावा देती है और मुसलमानों के खिलाफ हिंसा को सामान्य बनाने का काम करती है. जिससे एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी की जिम्मेदारी पर सवाल उठते हैं.