ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले के बीच एक बड़ा खुलासा हुआ है. new York Times की खबर के मुताबिक सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद सलमान ने Donald Trump से टेलीफोन पर बातचीत के दौरान कहा कि अमेरिका ईरान पर प्रहार जारी रखे. खबरों के मुताबिक प्रिंस सलमान लगातार अमेरिकी राष्ट्रपति पर प्रेशर बना रहे हैं कि वह ईरान पर हमला करते रहें. इस खबर में यह भी दावा किया गया है कि Donald Trump और नेतन्याहू रोजाना बातें कर रहे हैं इसके साथ ही साथ ट्रंप सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से भी रोजाना बात करते हैं। इस तरह से शिया बहुल ईरान के खिलाफ सुन्नी बहुत सऊदी अरब खुलकर अमेरिका और इजरायल के साथ नजर आ रहा है.
जानकार मानते हैं कि सऊदी अरब को इस बात का डर है कि ईरान किसी भी वक्त उन पर हमला कर सकता है. ऐसे में सऊदी अरब को लगता है कि ईरान के हमले के दौरान इजराइल ही उनकी मदद और सुरक्षा करेगा.
ईरान और सऊदी अरब के रिश्ते लंबे समय से प्रतिस्पर्धा, अविश्वास और क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई से प्रभावित रहे हैं। एक ओर शिया बहुल ईरान है, तो दूसरी ओर सुन्नी नेतृत्व वाला सऊदी अरब, और यही धार्मिक व वैचारिक अंतर दोनों के बीच टकराव की बड़ी वजह रहा है। यमन, सीरिया और लेबनान जैसे देशों में दोनों ने अलग-अलग गुटों का समर्थन किया, जिससे यह प्रतिस्पर्धा कई बार प्रॉक्सी युद्ध में भी बदलती रही। हालांकि 2023 में चीन की मध्यस्थता से दोनों देशों ने संबंध सुधारने की दिशा में कदम बढ़ाए और राजनयिक रिश्ते बहाल किए, जिससे क्षेत्र में तनाव कुछ हद तक कम हुआ।
मौजूदा परिदृश्य में, जब अमेरिका और इजरायल के साथ ईरान का तनाव बढ़ा हुआ है, सऊदी अरब बेहद संतुलित और सावधानीपूर्ण रुख अपनाता दिख रहा है। एक तरफ उसके अमेरिका से पारंपरिक रणनीतिक संबंध हैं, तो दूसरी ओर हालिया समझौते के बाद वह ईरान से खुला टकराव भी नहीं चाहता। ऐसे में सऊदी की कोशिश यही रहेगी कि वह सीधे युद्ध में शामिल होने से बचे, क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखे और जरूरत पड़ने पर कूटनीतिक संतुलन या मध्यस्थ की भूमिका निभाए। कुल मिलाकर, मौजूदा हालात में सऊदी अरब अपने आर्थिक, ऊर्जा और सुरक्षा हितों को ध्यान में रखते हुए “संतुलन की नीति” पर चलते हुए नजर आता है।